मोदी राज में “श्रमिकों का तो भगवान ही मालिक है” -नमिता नीरज सिंह

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जनबोल न्यूज

सर्वविदित है कि केंद्र सरकार द्वारा लॉक डाउन-4 की घोषणा कर दी गई है, जिसकी तिथि 31 मई तक निर्धारित की गई है। वैश्विक महामारी की इस विकट परिस्थिति में सबसे ज्यादा मार मजदूरों एवं श्रमिकों को झेलना पड़ा है। अगर हम विश्लेषण करें तो विगत 15 वर्षों में राज्य सरकार ने रोजगार एवं उद्योग- धंधे के मुद्दे को नजरअंदाज कर रखा है। राज्य में ना ही किसी बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरी की बहाली की गई और ना ही बिहार की इतनी बड़ी जनसंख्या को देखते हुए कोई उद्योग-धंधे स्थापित किए गए। पलायन का जोर निरंतर जारी रहा और एक बड़ी संख्या में राज्य से लोग पलायन कर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रोजी-रोटी की जुगाड़ में निकल पड़े। आज आलम यह है कि लाखों की संख्या में हमारे श्रमिक-मजदूर भाई बिहार से बाहर अपने परिवार की पेट पालने के लिए कार्य कर रहे हैं। आज जब लॉक डाउन की वजह से उद्योग-धंधे बंद हो गए हैं, दुकानें बंद हो गई। तब इन लाचार श्रमिकों के पास अपने जीवन यापन के लिए कोई साधन ना रहा। एक तो कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने की जद्दोजहद तो दूसरी तरफ अपने परिवार की पालन पोषण का भीषण जिम्मेवारी। मजदूर-श्रमिक आखिर जाएं तो कहां जाएं? वर्तमान राज्य सरकार ने तो सीधा ही कह दिया कि किसी भी कीमत पर श्रमिकों की घर वापसी नहीं होगी। हालांकि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के मैदान में डटे रहने की वजह से अंततः राज्य सरकार को झुकना पड़ा और गरीब मजदूरों की घर वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती, घर वापसी का फरमान तो मिल गया लेकिन यह गरीब मजदूर सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर आखिर घर आए तो कैसे आएं? बसों की समुचित व्यवस्था का नहीं होना, ट्रेनों मैं रिजर्वेशन की उचित व्यवस्था का अभाव। आखिरकार गरीब श्रमिकों ने यह ठान ही लिया कि अब चाहे जो भी हो घर तो पहुंचना ही है। मन में एक आस लिए असंख्य मजदूर सड़क मार्ग, पटरियों के सहारे, साइकिल, ठेला इत्यादि में अपने परिवार के साथ निकल पड़े। उन्हें बस आस थी कि किसी तरह घर पहुंचा जाए और सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हुए वे अपने घर के लिए निकल पड़े। उनका सामना रास्ते में कहीं पुलिस के डंडों से हुआ तो कहीं मौसम की बेरुखी की मार – कभी चिलचिलाती धूप तो कभी वर्षा की बूंदे। कई मजदूर तो रास्ते में ही भूख से तड़प तड़प कर जान गवां दिए और कई सड़क दुर्घटना में मौत के मुंह में समा गए। अगर देखा जाए तो वैश्विक महामारी, सरकार का पल्ला झाड़ना, मौसम की बेरुखी, भुखमरी की स्थिति एवं सड़कों पर असामयिक घटना का होना श्रमिकों के लिए अपार पीड़ादायक रहा। अंत में मैं आप सभी से यह पूछना चाहती हूं कि आखिर ये बेबस एवं लाचार मजदूर करे तो क्या करें? इनका तो भगवान ही मालिक है ।

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