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टेस्टिंग मामले पर प्रधानमंत्री का अपमान किया ललन सिंह ने लोजपा के पटना जिला अध्यक्ष चंदन यादव ने कहा कि विगत 11 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री कार्यालय से आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का ट्यूट बिहार में करोना की टेस्टिंग बढ़ाने की संदर्भ आया था जिसका समर्थन करते हुए लोक जनशक्ति पार्टी के द्वारा  ट्वीट किया गया कि कोरोना टेस्टिंग बढ़ाने की मांग लोक जनशक्ति पार्टी द्वारा पहले से ही की जा रही है .

लोजपा द्वारा किए गए ट्वीट में आगे लिखा गया कि अब विश्वास हो रहा है प्रधानमंत्री जी के एक्सपेक्ट के बाद बिहार सरकार टेस्टिंग बढ़ाएगी ताकि बिहार में कोरोना को नियंत्रित किया जा सके जिस ट्यूटर बाद जदयू के सांसद श्री लल्लन सिंह ने त्यंग करते हुए आदरणीय श्री चिराग पासवान जी और अपरोक्ष रूप से आदरणीय प्रधानमंत्री जी को कालिदास की संज्ञा दे डाली और कहा कि ए लोग जिस डाल पर बैठते हैं उसी डाल को काटते हैं पार्टी के सभी साथियों के साथ साथ आदरणीय प्रधानमंत्री जी के प्रशंसकों को समझ के पड़े हैं.

आदरणीय प्रधानमंत्री जी द्वारा कोरोना टेस्टिंग के बढ़ाने के संदर्भ में किए गए क्यूट का समर्थन करने पर क्यों ललन सिंह जी को तकलीफ हुई उनके इस बर्ताव से पार्टी के पार्टी के कार्यकर्ताओं और आदरणीय प्रधानमंत्री जी के प्रसंशको मेघ और निराश है लोक जनशक्ति पार्टी के वरिष्ठ साथियों ने इस पर अपना कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है पार्टी ने आदरणीय प्रधानमंत्री जी श्री नरेंद्र मोदी जी को नेतृत्व को आदर्श माना है परंतु आदरणीय प्रधानमंत्री जी द्वारा और उसके बाद पार्टी द्वारा बिहार के हित में लिखें जाने पर जदयू वरिष्ठ नेता का यह बर्ताव प्रधानमंत्री जी नेतृत्व पर प्रश्न उठता है नीतीश कुमार जी को प्रधानमंत्री जी का आशीर्वाद प्राप्त है उसके बावजूद श्री लल्लन सिंह प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री चिराग पासवान जी पर व्यंग कस रहे हैं पार्टी का एक-एक कार्यकर्ता और आदरणीय प्रधानमंत्री जी का प्रशंसक जदयू नेता के इस बयान से काफी क्षबुध और आक्रोशित हैं.

सभी जिला इकाइयों के अध्यक्षों से बात कर इस बात की शिकायत पार्टी के बिहार प्रधान महासचिव डॉ शहनवाज अहमद कैफी साहब जी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आदरणीय श्री चिराग पासवान जिससे पत्र लिखकर किए हैं इस मौके पर जिला प्रवक्ता मंजू गुप्ता दानापुर प्रखंड अध्यक्ष संजय यादव डॉ सुमन कुमार देवा यादव सुनील पासवान अमरजीत यादव विराज पासवान यदि मैं युद्ध

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आज पटना में छात्रसंगठन आइसा के द्वारा आइसा के राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस के तहत प्रदर्शन किया ,नई शिक्षा नीति वापस लो-शिक्षा का बाजारीकरण करना बंद करो-गरीबो-मध्यमवर्गीय को शिक्षा से वंचित करने का प्रयास नही चलेगा नारो के साथ.

सभा को संबोधित करते हुए आइसा के राज्य सह सचिव आकाश कश्यप ने कहा कि मोदी सरकार के द्वारा रात के अंधेरे में और बिना सदन में चर्चा किये हुए मोदी सरकार जो नई शिक्षा नीति लाए है इसके खिलाफ पूरे देश मे आज प्रदर्शन हो रहे है इस शिक्षा नीति का जब हम अध्य्यन करते है तो यह शिक्षा नीति गरीबों-मध्यमवर्गीय परिवार से शिक्षा वंचित करने वाली नीति है कुल मिलाकर जिसके पास पैसे रहेंगे वह शिक्षा ले पाएंगे दूसरी ओर उच्च शिक्षा पे हमला है शोध को कमजोर करने वाली नीति है जब देश मे शोध ही नही होगा तो भारत कैसे बनेगा

विश्वगुरु यह भारत का नौजवान पूछता है मोदी जी से इसलिए आइसा का साफ साफ मानना है यह शिक्षा नीति छात्र विरोधी नीति है आज से हमलोगों ने आंदोलन की शुरुवात किये है आने वाले दिनों में तमाम संगठन को एकजुट करके इसके खिलाफ जबरदस्त आवाज बुलंद करेंगे ,आकाश कश्यप ने कहा बिहार बाढ़ और कोरोना के जेहन में आईआईटी जेईई-नीट परीक्षा देने वाले परीक्षार्थी परीक्षा का डेट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं आइसा इस पेंडेमिक समय में छात्रों के मांग के साथ खड़ा है दूसरी तरफ बिहार में इंटर में एडमिशन चल रहा है आइसा ने बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को लेटर भेज कर मांग किया है कि एडमिशन का डेट बढ़ाया जाए और सहूलियत के साथ तमाम छात्रों का एडमिशन हो!

आज के प्रदर्शन मे आलोक यादव,मॉडल दीपू राज, सुमित जयसवाल,दीपक यादव,बसंत,जिनिश यादव,साहिल जैसवाल,आकाश नयन,रोहित गौतम,राहुल कुमार,रौशन सहित दर्जनों छात्र थे!

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अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी ने कहा कि बिहार कांग्रेस का बड़ा स्वर्णिम इतिहास रहा है। भारत में सभी बड़े बदलाव की शुरूआत बिहार से ही होती है। उन्होंने कहा यह आज की बात नहीं है हजारों साल से चली आ रही है, स्वतंत्रता आंदोलन की शुरूआत भी गांधी जी ने पश्चिमी चम्पारण से की थी। किसी भी अत्याचार, नफरत, भ्रष्टाचार एवं क्रोध के खिलाफ लड़ाई की शुरूआत बिहार की धरती से ही होती है। आज के संदर्भ में यह काम बिहार में कांग्रेस ही कर सकती है। यह काम मिलकर करना होगा एक दूसरे की इज्जत और प्रतिष्ठा का ख्याल रखते हुये सारी विपक्षी ताकतों को एक साथ एक मंच पर लाने का काम कांग्रेस का है।

हमने फरवरी में कोरोना सुनामी की चेतावनी दी थी, आज आप देख रहे हैं कि कोराना के मामले में हम विश्वगुरू बनने जा रहे हैं। आज फिर मैं कह रहा हूँ कि बिहार एवं पूरा भारत आने वाले छ: महिने, साल भर के अंदर इससे भी बड़ा तूफान का सामना करने जा रहा है, वह है बेरोजगारी का, डूबती अर्थ व्यवस्था का। इसका कारण यह है कि मोदी जी ने और आर एस एस ने मिलकर हमारी संस्थागत ढाँचों को ध्वस्त कर दिया है जिसे कांग्रेस ने बनाया था। पूरे भारत में आज संवैधानिक ढाँचे ध्वस्त हो चुके हैं। हमारी युवा शक्ति जाया होगी। पर यह देश फिर खड़ा होना जानती है। ढाँचा, रोजगार, अर्थ व्यवस्था को फिर खड़ा हो सकता है लेकिन प्यार से नफरत से नहीं और यह काम सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है।

प्रधान मंत्री झूठ बोलते हैं, हमारे सैनिकों के बलिदान का भी उनको ख्याल नहीं है। कहते हैं चाइना भारत की जमीन पर नहीं घुसा है? यह कह कर हमारे बिहार रेजिमें के मारे गये बीस सैनिकों का यह अपमान ही तो कर रहे हैं। सीमा पर संकट के समय बिहार रेजिमेंट आगे बढ़कर दुश्मनों से लोहा लेता है। प्रधानमंत्री जी का पोल खुल चुका है उनके ही रक्षा मंत्रालय ने इस बात की पुष्टी कर दी की चाइना हमारी जमीन के अंदर घुसा है। मैंने जब यह सुना कि चाइना ने हमारा हमीन हड़प लिया और हमारे बीस जवानों को शहीद कर लिया तो गुस्से से मेरा खून खौल गया।

हम यहाँ यह भी बताना चाह रहे हैं कि सुशासन की बात करने वाले हमारे मुख्य मंत्री, विकास की बात करने वाले मुख्यमंत्री आज चुप क्यों हैं, उनकी जनता त्राहिमाम कर रही है। उनकी निष्क्रियता जग जाहिर हो चुकी है।

आज हम यहाँ यह कहना चाहते हैं कि अगली सरकार बिहार में हमारी होगी। हम मिलजुल कर सरकार बनायेंगे। बदलाव अब बिहार से शुरू होगा। हमारे मुख्य मुद्दे हैं रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य। रोजगार बड़े एवं लघु उद्योगों से मिलेगा। बिहार की शक्ति को फिर से संजोना पड़ेगा। प्यार और इज्जत से सहयोगी बनाना होगा और मिलकर निर्णय लेना होगा।

उन्होंने बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल एवं प्रदेश अध्यक्ष को यह निर्देश दिया कि शीघ्र सीटों के बँटवारे के मामले पर बातचीत कर उसे अंतिम स्वरूप दें। सारे विपक्ष से बात करें और चुनाव की लड़ाई शुरू करें।

कोरोना काल में सबसे ज्यादा बिहार सरकार असफल रही है। मजदूरों के बारे में यह सरकार बात नहीं करती, भ्रष्टाचार के बारे में बात नहीं करती,

में बात नहीं करती, बेरोजगारों के बारे में बात नहीं करती, हम करेंगे, कांग्रेस करेगी, बिहार कांग्रेस के साथ पूरा विपक्ष मिलकर करेगी और इस सरकार के खिलाफ लड़ेगी लेकिन सकारात्मक दृष्टिकोण एवं उपागम से।

श्री राहुल गाँधी आज सुबह 11.00 बजे प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष, अभियान समिति के अध्यक्ष, कांग्रेस सांसद एवं पूर्व सांसद, विधायक एवं पूर्व विधायक, प्रदेश कांग्रेस कमिटी के पदाधिकारी, जिला कांग्रेस कमिटी एवं प्रखण्ड कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष, मोर्चा संगठनों के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को वीडिया संवाद से सम्बोधित कर रहे थे। इस अवसर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के महासचिव (संगठन) श्री के0सी0 वेणुगोपाल, एम०पी०, प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल एम०पी०, प्रदेश कांग्रेस के सह प्रभारी बीरेन्द्र सिंह राठौड़, श्री अजय कपूर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री तारिक अनवर एवं शत्रुघ्न सिन्हा, आई0टी0 विभाग के अध्यक्ष रोहण गुप्ता, प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष डा0 मदन मोहन झा, कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता सदानन्द सिंह, प्रदेश कांग्रेस अभियान समिति के अध्यक्ष डा0 अखिलेश प्रसाद सिंह एम०पी०, प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष डा0 अशोक कुमार, श्याम सुन्दर सिंह धीरज, डा0 समीर कुमार सिंह, पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार के अलावे कांग्रेस के विधायक, पूर्व विधायक उपस्थित थे।

__श्री राहुल गाँधी ने बिहार के कांग्रेसजनों का आह्वान किया कि वे बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का सघन दौरा करें और बाढ़ प्रभावित लोगों को यथासम्भव सहायता पहुँचाये। उन्होंने कहा कि देश के साथ बिहार में भी कोरोना वायरस बड़ी तेजी से फैल रहा है तथा हमें इस पर भी नजर रखनी है।

देश में बढ़ती बेरोजगारी एवं अर्थव्यवस्था पर निशाना साधते हुए श्री राहुल गाँधी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में रोजगार के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया गया था, जबकि देश के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी के 2014 के लोकसभा चुनाव में 2 करोड़ युवाओं को प्रत्येक वर्ष नियोजित करने का वायदा किया था लेकिन आज देश में बिगड़ती अर्थ-व्यवस्था एवं दीर्घकालीन लाकडाउन के चलते बेरोजगार युवाओं की फौज लगातार बढ़ रही है।

श्री राहल गाँधी ने कहा कि बिहार में लाकडाउन कोरोना वायरस एवं बाढ के कारण वे कांग्रेसजनों से वर्चुअल संवाद स्थापित कर रहे हैं लेकिन आनेवाले समय में वे बिहार का व्यापक दौरा करेंगे एवं जिला एवं प्रखण्ड तक जायेंगे।

इससे पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के महासचिव (संगठन) श्री के0सी0 वेणुगोपाल एम०पी०, अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल एवं बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष डा0 मदन मोहन झा ने कहा कि श्री राहुल गाँधी देश के भविष्य हैं और उनकी ही नहीं बल्कि बिहार के कांग्रेसजनों की भावना का आदर करते हुए उन्हें कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व संभालना चाहिए.

इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल एम0पी0 एवं संगठन के महासचिव के0सी0 बेणुगोपाल एम0पी0 ने कांग्रेस पार्टी की डिजिटल सदस्यता अभियान की समीक्षा की और इसमें तेजी लाने का निर्देश दिया।

इस अवसर पर इस वर्चुअल संवाद को कांग्रेस विधान मण्डल दल के नेता सदानन्द सिंह, अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के सचिव बीरेन्द्र सिंह राठौर, अजय कपूर, पूर्व केन्द्रीय मंत्री तारिक अनवर, शत्रुघ्न सिंहा, प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष डा0 अशोक कुमार, श्याम सुन्दर सिंह धीरज, डा0 समीर कुमार सिंह एम0एल0सी0, पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार, शकील उज्जमा अन्सारी ने भी सम्बोधित किया।

इस अवसर पर वर्चुअल संवाद में सदाकत आश्रम में प्रदेश कांग्रेस के मीडिया विभाग के अध्यक्ष एच0के0 वर्मा एवं प्रवक्ता राजेश राठौड़ भी शामिल रहे।

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भगवान राम के जन्म स्थली पर भव्य राम मंदिर निर्माण के सिलसिले मे आयोजिक भूमि पूजन का बिहार के पुर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माँझी ने स्वागत किया है।माँझी ने मंदिर के भूमिपूजन का स्वागत करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि जल्द ही मस्जिद निर्माण का काम भी शुरू कराया जाए।माँझी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री जी ने आज भूमि पूजन किया या शिलान्यास रखा है, जिसके लिए मैं प्रधानमंत्री जी का आभार व्यक्त करते हैं और शुभकामना देता हूं कि जल्द से जल्द भव्य मंदिर बन जाए, ताकि हिंदुस्तान नहीं समस्त संसार के करोड़ों भक्तों की आस्था उनमें है ।

मांझी ने कहा भगवान राम के आस्था से लोग जुड़े हुए हैं ऐसी परिस्थिति में यह लगभग 500 वर्षों के बाद संपन्न हो रहा है । यह ऐतिहासिक दिन है । इस ऐतिहासिक दिन पर ऐसा कार्य संपादित के लिए हम शुभकामना देते हैं । हम बधाई देते हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी जी को।

मांझी ने कहा कि इस शुभ अवसर पर एक बात हमारे सामने आती है जब भगवान राम माता शबरी को जिस प्रकार से उन्होंने प्राण देने का उनको कल्याण करने का काम किया था और सो हुआ था, उससे दलित और और अधि वंचित वर्गों के लिए भगवान राम काम करते हैं । वैसे परिस्थिति में हमारे देश में सौभाग्य बस राष्ट्रपति हमारे रामनाथ कोविंद जी हैं उनको यदि मंच पर बुला लिया जाता तो हम समझते थे कि भगवान राम के जहां भी उनकी आत्मा जहां भी होती बहुत ही खुश होते, साथ ही साथ चाहे लालकृष्ण आडवाणी जी, जोशी जी, उमा भारती जी, गोविंदाचार्य अन्य लोगों ने राम मंदिर निर्माण से इन लोगों को बहुत सा संकट झेलना पड़ा था। उन लोगों को भी मंच पर रखा जाता तो ज्यादा अच्छा था।

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लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व सांसद श्री चिराग पासवान, प्रदेश अध्यक्ष व सांसद प्रिंस राज जी ने आज अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास तथा कार्यारम्भ पर देश के प्रधानमंत्री श्री नरेद्र मोदी जी को बधाई देते हुए कहा कि भगवान श्री राम का मंदिर का निर्माण भारतीय संस्कार और भारतीय संस्कृति की अमिट पहचान को पूरे विश्व में स्थापित करेगा।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने आज मंदिर निर्माण का शिलान्यास करके पूरे विश्व में शांति और सदभावना का संदेश दिया है। श्री चिराग ने अपने बयान में कहा कि कई सदियों के उपरान्त आज भगवान श्री राम के मंदिर के निर्माण का शुभारंभ हुआ है। श्री राम की परम भक्त माता शबरी का वंशज होने के नाते मेरे लिए आज का दिन एतेहासिक है तथा मेरे लिए सौभाग्य की बात है।

श्री चिराग ने कहा कि श्री राम को किसी देश एवं जाति तथा धर्म में रही बाँधा जा सकता है। भगवान राम सब के थे वे शबरी के भी थे, केवट के भी थे। देश में संविधानसम्मत और लोकतांत्रिक मुल्यों और न्यायिक व्यवस्था के अनुरूप मंदिर निर्माण का कार्य की शुरूआत संपूर्ण देशवासियों के लिए गौरव की बात है। आज मंदिर निर्माण के साथ-साथ भगवान राम के आदर्श तथा उनके चरित्र को अपना कर ऐसे समाज का भी निर्माण करना होगा जहाँ किसी से भेदभाव न हो।

उक्त आशय की जानकारी लोजपा के प्रदेश प्रवक्ता श्रवण कुमार अग्रवाल ने दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से आज अयोध्यापुरी में बहुप्रतीक्षित भव्य श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन एवं कार्यारम्भ सम्पन्न हुआ।आज वार्ड संख्या 04,स्थित हनुमानगढ़ी मंदिर में कला संस्कृति मंत्री प्रमोद कुमार सहित भाजपा के अनेक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने उक्त कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देखा।इस ऐतिहासिक अवसर पर हनुमानगढ़ी मंदिर में श्री कुमार द्वारा प्रचूर मात्रा में महाप्रसाद के रूप में लड्डू की व्यवस्था की गई।

उक्त अवसर पर मंत्री श्री कुमार ने कहा कि देश के यशश्वी प्रधानमंत्री की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण का रास्ता प्रशस्त हुआ।उन्होंने कहा कि पांच दशक लम्बे संघर्ष और बलिदान के बाद आज का दिन देखने का सौभाग्य देशवासियों को प्राप्त हुआ।भगवान राम ने पारिवारिक,सामाजिक और राजनीतिक जीवन के उच्च आदर्शों को स्थापित किया,जो हर व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है।

जिलाध्यक्ष भाजपा प्रकाश आस्थाना ने कहा कि श्री राम राजनीति नहीं बल्कि हमारी आस्था और भारत की सनातन संस्कृति के प्रतीक रूप में उच्च आदर्शों के प्रतीक हैं।आज का दिन भारत के गौरवशाली सांस्कृतिक इतिहास के पृष्ठों में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में जुड़ गया है।

प्रदेश प्रवक्ता भाजपा अखिलेश सिंह ने कहा कि प्रभु राम सामाजिक समरसता, सामाजिक सौहार्द,सांस्कृतिक पहचान,राष्ट्रीय गौरव और प्राणी मात्र के कल्याण के प्रतीक हैं।उनके जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण से जिस रामराज्य की कल्पना महात्मा गांधी ने की थी,उसका नींव पड़ा है।

उक्त अवसर पर नगर अध्यक्ष उत्तरी मंडल योगेन्द्र प्रसाद,महामंत्री उत्तम मिश्रा,सुमन सिंह,सागर शुभम,उद्देश्य कुमार,रामचंद्र प्रसाद,रवि कुमार,मनिंदर कुमार उर्फ पुकुल जी सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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भगवान श्री राम के मंदिर की नींव पर रखी जाने वाली प्रत्येक ईंट राष्ट्र गौरव को शिखर की ओर ले जाएगी। उक्त बातें आज सांसद मोतिहारी,चेयरमैन रेलवे स्टैडिंग कमिटी सह पूर्व केन्द्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने जिला भाजपा कार्यालय में श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन एवं कार्यारम्भ का सीधा प्रसारण देखने के बाद कहीं।

श्री सिंह ने कहा कि आज मंदिर की आधारशिला के साथ ही राष्ट्र निर्माण की आधारशिला रखी गई है। यह भारत के स्वाभिमान, आत्मसम्मान और भारत की आध्यात्मिक विरासत का भी जयगान है। आज करोड़ों देशवासियों का सपना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कर कमलों द्वारा साकार हुआ।मौके पर जिला महामंत्री मार्तण्ड नारायण सिंह,कामेश्वर चौरसिया,पप्पू पाण्डेय सहित अन्य लोग उपस्थित थे।

उक्त आशय की जानकारी जिला मीडिया प्रभारी,भाजपा गुलरेज शहजाद ने जारी विज्ञप्ति के माध्यम से दी।

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मोदी कैबिनेट द्वारा नई शिक्षा नीति को पारित कर दिया गया है। जहां एक ओर सरकार का कहना है की नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को आसान बनाना है वहीं अगर नई शिक्षा नीति का गहराई से अध्ययन किया जाए तो इस नीति का उद्देश्य सरकार के दावों के ठीक विपरीत दिखाई देता है। नई शिक्षा नीति समाज में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों को बहिष्कृत करने की नीति है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का आधार प्रधानमंत्री का इस साल का सबसे मशहूर जुमला “आत्मनिर्भर” है। नई शिक्षा नीति के उद्देश्य एवं सिद्धांत अधिकार आधारित दृष्टिकोण की बजाए कर्तव्य आधारित दृष्टिकोण की तस्वीर पेश करते हैं। अर्थात सरकार अपने शिक्षा सुनिश्चित करने के दायित्व से पीछे हटकर यह कार्य प्राइवेट सेक्टर को सौंप रही है साथ ही निजी क्षेत्रों को विचारों को नियंत्रित करने का अधिकार दे रही है।

उच्च शिक्षा में मल्टीपल एग्जिट प्वाइंट (अर्थात 4 साल के ग्रेजुएशन को पहले, दूसरे अथवा तीसरे वर्ष में भी छोड़ देने पर सर्टिफिकेट) एडवांस सर्टिफिकेट इत्यादि के प्रबंध को नई शिक्षा नीति का आकर्षण बिंदु बनाकर इस नीति को एक बड़े सकारात्मक बदलाव के रूप में पेश किया जा रहा है, किंतु वास्तविकता तो यह है कि इस तरह का प्रावधान अंततःअसमानता को ही बढ़ावा देगा। इस तरह की नीति गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को और अधिक हाशिए पर ढकेलेगी तथा शिक्षा का अधिकार एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगा। यह नीति अकादमिक एकरूपता के जरिये से विचारों को नियंत्रित करने की भी कोशिश है। तदनुसार आम परीक्षाओं एवं प्रशासन पर केंद्र का नियंत्रण है किंतु निजी एवं सार्वजनिक संस्थानों को लोगों का शोषण करने की पूर्ण वित्तीय स्वतंत्रता है।

नई शिक्षा नीति का केवल एक ही प्रयोजन है और वह है निजी संस्थानों को बढ़ावा देना। इस नीति द्वारा सरकार अपने इस मंसूबे को स्कूल तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी तथा सार्वजनिक-परोपकार की साझेदारी का चोगा ओढ़ा रही हैl एनईपी निजी कंपनियों और सरकार को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराती है । देश में लंबे समय से छात्र आंदोलनों की निजी शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाइयों की नीतियों को लागू करने की मांग के बावजूद एनईपी में इसका जिक्र तक नहीं है।

एनईपी संविधान के संघीय ढांचे पर भी हमला हैl शिक्षा समवर्ती सूची में है तथा परामर्श और समन्वय की मांग करता है, एकरूपता की नहीं ।इसी तरह, नीति का प्रारूप ऑनलाइन शिक्षा और शिक्षण में प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने की बात करता है, लेकिन छात्रों के लिए इस प्रौद्योगिकी की पहुंच और सामर्थ्य का विस्तार कैसे होगा यह सुनिश्चित करने में विफल है ।

एनईपी स्पष्ट रूप से सरकार द्वारा यह दावा करने कि शिक्षा पर खर्च में वृद्धि होगी इस विषय पर चर्चा नहीं करती कि यह होगा कैसे। निवेश और व्यय का बोझ “निजी परोपकार” साझेदारी के माध्यम से निजी कंपनियों और व्यक्तियों पर है, जो स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों के कॉर्पोरेट अधिग्रहण के लिए एक चोगा मात्र है ।

सरकार स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों स्तर पर स्व-नियमन को बढ़ावा देकर शिक्षा क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी त्याग कर निजी कंपनियों को बढ़ावा दे रही है। एनईपी बड़े स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पक्ष में छोटे स्कूलों और कॉलेजों को बंद करना प्रस्तावित करता है, जो सार्वजनिक वित्त पोषित शिक्षा को नष्ट करने के अलावा कुछ भी नहीं है ।

स्कूल शिक्षा:
एनईपी स्कूल शिक्षा में मौजूदा 10 + 2 संरचना को “एक नए शैक्षणिक और पाठयक्रम पुनर्गठन” के साथ 5+ 3+3+4 में बदलने का प्रस्ताव रखता है और इस संरचना में 3 से 18 वर्ष के छात्र-छात्राएं सम्मिलित होंगे। एनईपी का तर्क है कि वर्तमान 10+2 संरचना 3-6 आयु वर्ग के बच्चों पर ध्यान नहीं देती है क्योंकि औपचारिक शिक्षा कक्षा 1 में शुरू होती है और वह 6 साल की उम्र में शुरू होती है। इसलिए नई 5+3+3+4 संरचना, 3 साल की उम्र से अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन (ईसीसीई) प्रदान करेगी।

ईसीसीई की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी केंद्रों की है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं/शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा, खेलने के उपकरण और अच्छे बुनियादी ढांचे की व्यवस्था की जाएगी। यहां तक कहा गया है कि 10+2 और उससे अधिक की योग्यता वाले आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं/शिक्षकों को ईसीसीई में 6 महीने का प्रमाण पत्र कार्यक्रम दिया जाएगा; और कम शैक्षिक योग्यता वाले लोगों को एक वर्ष का डिप्लोमा कार्यक्रम दिया जाएगा। बच्चों के लिए शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए डीटीएच चैनलों का इस्तेमाल और डिजिटल/दूरी के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल प्रस्तावित किया गया है ।

हालांकि, दस्तावेज अनुबंध, मानदेय आधारित कार्य के बजाय स्थायी नौकरी की गारंटी देने में विफल हैl स्थायी नौकरी तो दूर की बात है, न्यूनतम वेतन की गारंटी भी नहीं है। डिजिटल डिवाइड के सवाल पर यह दस्तावेज यह नहीं बोलता कि इससे उन लोगों तक डिजिटल पहुंच कैसे बढ़ेगी, जिनके पास टीवी, बिजली, इंटरनेट, स्मार्ट फोन या गैजेट्स तक नहीं है। इंटरनेट की पहुंच राष्ट्रीय स्तर पर केवल 40% है और ग्रामीण क्षेत्र और भी हाशिए पर हैं ।

एनईपी का तर्क है “प्रशिक्षित सहायककर्मी (स्थानीय समुदाय से व उसके बाहर दोनों) “, उसके अतिरिक्त सहायता सत्र, कैरियर मार्गदर्शन से संबंधित मुद्दों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की देखरेख और सुरक्षा पहलुओं को देखते हुए “एक पर एक सहकर्मी ट्यूशन” की व्यवस्था की जाए। साफ तौर पर सरकार सार्वजनिक शिक्षा में गुणवत्ता और सस्ती शिक्षा प्रदान करने की अपनी जिंमेदारी से दूर रहना चाहती हैl

सरकार की अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश:
नई शिक्षा नीति निजीकरण शब्द के इस्तेमाल से बचते हुए सरकार द्वारा शिक्षा से जुड़ी हुई अपनी सभी जिम्मेदारियों को त्याग कर निजी संस्थानों को जनता का आर्थिक शोषण करने की सुविधा उपलब्ध कराने का नाम है। यह नीति निजीकरण को सार्वजनिक-परोपकार साझेदारी का नाम देकर शिक्षा जैसी मूलभूत जिम्मेदारी से सरकार का पल्ला झाड़ लेना है।

अन्य भाषाओं पर संस्कृत का वर्चस्व:
अन्य भाषाओं को नजरअंदाज करते हुए संस्कृत संवर्धन पर अत्यधिक जोर देना मोदी सरकार की संस्कृत के वर्चस्व को स्थापित करने की मंशा को स्पष्ट करता है। दस्तावेज में अन्य भाषाओं की बात जरूर की गई है किंतु संस्कृत पर दिया गया अत्यधिक जोर सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। इसी प्रकार भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणाली और प्रथाओं पर सरकार का अत्यधिक ध्यान बाद में देश के विभिन्न चरणों में विकसित अन्य प्रथाओं को नजरअंदाज और अस्वीकार करने का प्रयास जैसा लगता है। “जहां भी संभव हो, कम से कम ग्रेड 5 तक लेकिन अधिमानतः ग्रेड 8 और उससे आगे तक अनुदेश का माध्यम घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा होगीl” यह शिक्षा के माध्यम में एक व्यवस्थित परिवर्तन है और शिक्षकों की उपलब्धता, शिक्षा सामग्री की गुणवत्ता और यह भी कि इसे कैसे लागू किया जाएगा, पर सवाल उठते हैं। सार्वजनिक तथा निजी दोनों संस्थानों में इस प्रकार मातृभाषा को अनिवार्य बनाना विद्यार्थियों को उस भाषा में शिक्षण लेने से वंचित करता है जिसमें वे शिक्षित होना चाहते हैं।

सरकारी स्कूलों को बंद करना:
एनईपी 2020 स्कूल कॉम्प्लेक्स नामक समूह संरचना के नाम पर सरकारी स्कूलों को “सुनियोजित ढंग से” बंद करने को बढ़ावा देता है। जिसमें स्कूलों में कम नामांकन अनुपात स्कूल बंद होने का कारण दिखाया जा रहा है। सरकारी स्कूलों में कम नामांकन अनुपात का कारण वास्तव में सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता की कीमत पर निजी स्कूलों को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना और स्कूली शिक्षा से संबंधित शिक्षण, अधिगम और बुनियादी ढांचे के मुद्दों में सार्वजनिक निवेश की कमी है। त्रुटिपूर्ण नीति को ठीक करने के बजाय एनईपी 2020 सरकारी स्कूलों को बंद करने को बढ़ावा देता है।

निजी स्कूलों को आर्थिक शोषण की खुली छूट:
एनईपी ने आवश्यक गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रीस्कूल एजुकेशन-निजी, सार्वजनिक और परोपकारी सहित शिक्षा के सभी संस्थानों के लिए स्व-नियमन या प्रत्यायन प्रणाली का प्रस्ताव दिया है। राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एसएसएसए) नामक एक स्वतंत्र, राज्यव्यापी निकाय की स्थापना की जाएगी। यह और कुछ नहीं बल्कि सरकार द्वारा गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निजी कंपनियों पर छोड़ने के लिए एक आवरण है जैसा कि सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी किया गया है ।
उच्च शिक्षा:
समरूपता और अकादमिक स्वतंत्रता का केंद्रीकरण:
सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और संस्थानों के लिए राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा परीक्षाओं के संचालन का केंद्रीकरण हालांकि आदर्श लगता है, लेकिन वास्तव में यह कॉलेजों/विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता से वंचित करता है। फिलहाल, एनईपी बोझ को कम करने की बात करता है किंतु NEET तथा अन्य अखिल भारतीय परीक्षाओं का NTA अथवा अन्य एजेंसियों द्वारा केंद्रीकृत आयोजन नई समस्याओं को जन्म देगा।

सार्वजनिक वित्त पोषित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को बंद करना:
स्कूल शिक्षा की तरह ही एनईपी मे 3000 या उससे अधिक छात्रों के बड़े बहुविषयक विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और एचईआई क्लस्टर/नॉलेज हब का गठन प्रस्तावित करती है। इसका स्पष्ट अर्थ है- बड़े बहुविषयक विश्वविद्यालयों के पक्ष में छोटे या मध्यम सरकारी वित्त पोषित विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों या संस्थानों को बंद करना। सबसे नृशंस रूप से, यह दस्तावेज नालंदा और तक्षशिला के संदर्भ का उपयोग बड़े विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए कॉलेजों को बंद करने के अपने बुरे इरादों वाले तर्क को न्यायोचित ठहराने के लिए करता है ।

पुनर्गठन के नाम पर सार्वजनिक वित्तपोषण का निजीकरण अथवा समापन:
ये उच्च शिक्षा संस्थान (एचईआई) भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) द्वारा शासित होंगे । एचईसीआई के तहत एचईआई के प्रत्येक मुद्दे से संबंधित विभिन्न इकाइयां होंगी जो संरचना का हिस्सा होंगी। राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी) शिक्षक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए एकल बिंदु नियामक होगा केवल चिकित्सा और कानूनी शिक्षा इसके अंतर्गत नहीं होंगे। दूसरी संस्था ‘Meta-Accrediting Body’ (जिसे मान्यता के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (एनएसी) कहा जाता है) होगी। तीसरा उच्च शिक्षा अनुदान परिषद (एचईजीसी) होगा, जो फंडिंग नियमित करेगा । चौथी संस्था होगी जनरल एजुकेशन काउंसिल जोकि अकादमिक स्तर को बेहतर बनाने का कार्य करेगी। इसका तकनीकी रूप से अर्थ है यूजीसी और अन्य मौजूदा निकायों को खत्म किया जाएगा।

इन एचईआई की अध्यक्षता बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (बीओजी) करेंगे। बीओजी के पास फीस पर फैसला करने, एचईआई के प्रमुख सहित नियुक्तियां करने और शासन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होगाl शासन का यह मॉडल स्वायत्तता और अकादमिक उत्कृष्टता को केंद्रीकृत और नष्ट कर देगा।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जैसी विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा अनुसंधान के वित्तपोषण के समन्वय के लिए एक राष्ट्रीय अनुसंधान कोष की स्थापना की जाएगी। यह समन्वय स्वायत्त वित्तपोषण व्यवस्था को नियंत्रित करने के अलावा कुछ नहीं हैl

एनईपी में यह भी कहा गया है कि निजी और सार्वजनिक संस्थानों के बीच कोई अंतर नहीं होगा, जो सार्वजनिक संस्थानों के वित्तपोषण से सरकार के पीछे हटने का संकेत देता है । इस बीच, एक स्वायत्त डिग्री देने वाले कॉलेज (एसी) उच्च शिक्षा के एक बड़े बहुविषयक संस्थान का गठन होगा जो स्नातक की डिग्री प्रदान करेगा और मुख्य रूप से स्नातक शिक्षण पर केंद्रित होगा, हालांकि यह उस तक सीमित नहीं रखा जाएगा और यह आम तौर पर एक आम विश्वविद्यालय से छोटा होगा ।

शिक्षा के भीतर सामाजिक भेदभाव का कोई संज्ञान नहीं, सामाजिक न्याय के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं:
यह वही भाजपा की सरकार है जिस के शासन में पूरे देश ने रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के विरोध में एक व्यापक आंदोलन देखा । रोहित के लिए न्याय की मांग करते हुए इस आंदोलन में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हाशिए के समाज से आने वाले विद्यार्थियों के प्रति होने वाले भेदभाव तथा उत्पीड़न की ओर सभी का ध्यान केंद्रित किया गया। और आज यही भाजपा की सरकार नई शिक्षा नीति पारित कर रही है जिसमें शैक्षिक संस्थानों में होने वाले भेदभाव एवं उत्पीड़न के विषय में कोई बात नहीं की गई है। नई शिक्षा नीति संस्थागत उत्पीड़न एवं भेदभाव को वंचित एवं हाशियाकृत विद्यार्थियों की समस्या की तरह देखती है और सरकार को संस्थानों में समता एवं न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से दूर रखती है।

वर्गीकृत असमानता और बच्चों को पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर करना:

एनईपी से 4 वर्षीय बहुविषयक बैचलर कार्यक्रम एक आपदा होगा जैसा कि हमने दिल्ली विश्वविद्यालय में FYUP प्रणाली के साथ देखा है। जिसका न केवल छात्रों और शिक्षकों ने विरोध किया बल्कि अंततः शिक्षा और शिक्षा देने में विफल रहने पर प्रशासन को भी इसे वापस लेना पड़ा। उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री/एग्जिट का मतलब है कि अच्छी फाइनेंशियल कंडीशन वाले स्टूडेंट्स ही अपनी डिग्री पूरी कर पाएंगे । गरीब छात्रों को डिप्लोमा से ही समझौता करना होगा। साथ ही एक साल में सर्टिफिकेट, 2 साल में डिप्लोमा, 3 साल में बैचलर मूल रूप से डिग्रियों का अवमूल्यन है क्योंकि इन डिग्रियों को लेने के लिए मजबूर किसी को भी पढ़ाई बीच में छोड़ने वाला माना जाएगा। यदि इन पाठ्यक्रमों को अलग नहीं कर रहे हैं, और एक बड़े 4 साल मॉड्यूल का ही हिस्सा सर्टिफिकेट डिप्लोमा तथा बैचलर हैं, तो यह डिग्रियों का अवमूल्यन ही है।

निजी विश्वविद्यालयों को फण्ड एवं बढ़ावा देने वाली एक नीति:
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 समय समय पर शिक्षा में निजी निवेश एवं परोपकार की ‘महत्ता’ पर बल देती है। यह न केवल निजी निवेश एवं परोपकारी उद्यमों को आमंत्रण है जिससे कि वे उच्च शिक्षा में अपने व्यापार को बढ़ा सकें, बल्कि ये ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों को सरकारी सहायता का भी वादा करती है। हम सभी जानते हैं कि ऐसे परोपकारी उच्च शिक्षा संस्थान कौन होंगे। यह उच्च शिक्षा के निजी एवं कॉरपोरेट नियंत्रण की व्यंजना ही है।
पहले तो नीति नए उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए कम नियंत्रण का वायदा करती है। जबकि एक और स्तर और मानकों के नाम पर, राष्ट्रीय शिक्षा नीति सरकारी वित्त पोषित संस्थानों को बंद करने का एक यंत्र है, वहीं दूसरी ओर यह नए विश्वविद्यालयों को खोलने में गुणवत्ता और स्तर की चिंता न करने का वायदा करता है। इससे इतर, शुल्क निर्धारण के प्रगतिशील राज को प्रोत्साहित करके यह नीति स्पष्ट तौर पर उच्च शिक्षा में शुल्क वृद्धि और बहिष्करण का सृजन कर रही है।

स्वायत्तता के नाम पर शुल्क वृद्धि और स्ववित्तपोषण को लागू करना:
महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के पास श्रेणीबद्ध स्वायत्तता होगी। प्रत्यायन की श्रेणियाँ किसी संस्थान की स्वायत्तता निर्धारित करेंगी। कोई संस्थान जिसकी प्रत्यायन की श्रेणी उच्च होगी वह शुल्क वृद्धि कर सकेगा, इस प्रकार गरीबों और वंचितों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बहिष्कृत कर दिया जायेगा क्योंकि विश्वविद्यालय निश्चित तौर पर नये स्व-वित्तपोषी पाठ्यक्रम लायेंगे जिससे कि वे स्वयं ही फण्ड इकट्ठा कर सकें। यह पहले ही कुछ समय से कार्य में लाया जा चुका है, जैसे कि यूजीसी का परिसमापन और HEFA ऋणों की स्वीकृति को पहले ही मूर्त किया जा चुका है।

निजी विश्वविद्यालयों को शोषण की स्वतंत्रता:
स्वविनियमन की प्रणाली निजी विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करेगी जहाँ संस्थान को शिक्षा, सीखने, अवस्थापना, शुल्क एवं अन्य मुद्दों पर स्व-घोषणा देनी होगी। इस प्रकार यह सरकार के नियंत्रण का अंत करेगी। यह उच्च शिक्षा में भयंकर परिणामों की ओर लेकर जाएगी जिसमें निजीउद्द्मियों को फ़ीसवृद्धि करने औऱ गरीबों एवं वंचितों के बहिष्कृत करने में कोई रोक-टोक नहीं होगी।

ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर डिजिटल डिवाइड और बहिष्करण मजबूत करना:
शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन शिक्षा शुरू करने पर जोर दिया गया है। यह और कुछ नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था से समाज के हाशिए पर स्थित समुदायों से आने वाले विद्यार्थियों को बाहर करने की नीति है। यह नीति इस बारे में बात नहीं करती है कि यह कैसे इंटरनेट पहुंच बढ़ाएगी, डिजिटल डिवाइड को कम करेगी और शिक्षा की पहुंच, और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी। इसी तरह, दूरस्थ शिक्षा पर जोर शिक्षा के विचार के खिलाफ जाता है। NEP एक स्वायत्त निकाय, नेशनल एजुकेशनल टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) बनाने की बात करती है,जो “उच्च शिक्षा, मूल्यांकन, नियोजन, प्रशासन स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों के लिए” प्रदान करेगा। हालाँकि नीति यह बात नहीं करती है कि यह डिजिटल विभाजन को कैसे समाप्त करने जा रही है। यह ऐसी शिक्षा के लिए आवश्यक डिजिटल गैजेट्स की पहुंच को कैसे बढ़ाएगीl नीति फंडिंग के विषय में कुछ स्पष्ट नहीं करती जिसका सीधा अभिप्राय यह है कि इसका भार विद्यार्थियों पर थोप दिया जाएगा और निजीकरण के लिए मार्ग प्रशस्त होगाl

एमफिल को खत्म करना और एकीकृत कार्यक्रम में एमए की अवधि को कम करना केवल मोदी सरकार के शोध के प्रति समझ की कमी को दर्शाता है । एमफिल प्रशिक्षण का मैदान है और अनुसंधान की गुणवत्ताको बढ़ाने में इसका महत्व है। एमफिल को हटाकर सरकार ने भारत में रिसर्च को फंडिंग और सपोर्ट कम करने के अपने इरादे का संकेत दिया है। “शैक्षणिक मार्ग” के बारे में नई नीति का मूल रूप से मतलब है (भले ही यह बेहतर पाठ्यक्रमों को डिजाइन करने और एक बेहतर शिक्षक होने की गुंजाइश देता है) शिक्षक बुनियादी कक्षाएं ले सकते हैं और प्रशासन/शासन में पद सुनिश्चित करने की सीढ़ी पर आगे बढ़ने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं । यह विश्वविद्यालय प्रणाली में शिक्षण की स्वायत्त प्रकृति को खत्म करने तथा सरकार के हुक्म के अनुसार चलने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने की ओर एक कदम है।

समावेश के नाम पर यह नीति वास्तव में, बहिष्कार के लिए नीति के अलावा कुछ नहीं है। AISA इस शिक्षा विरोधी मसौदे को खारिज करता है और मांग करता है कि इसे तुरंत वापस लिया जाए और संसद में इस पर चर्चा की जाए।

जनबोल न्यूज

समस्त भारत कोविड 19 जैसी महामारी से परेशान हैं, जिसके साथ ही साथ लोग आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे है। ऐसे में इस बीमारी से लड़ने में सब समाज की अहम भूमिका होनी चाहिए.  खासकर गरीब जनता को बीमारी से बचाने हेतु राशन और खाद वितरण उपभोक्ता के घर-घर जाकर किया जाना चाहिए। ये बाते प्रधानमंत्री जन कल्याणकारी योजना के प्रदेश महामंत्री महिला प्रकोष्ठ सह भारतीय खाद्य निगम की सलाहकार समिति सदस्य श्रीमती संगीता सिन्हा ने कही है।

राशन और खाद वितरण संबंधी समस्याओं पर उन्होंने कहा कि प्रत्येक वार्ड के पार्षद और डीलर को जानकारी होती है कि उसके क्षेत्र में कौन-कौन उपभोक्ता है और कौन कौन से व्यक्ति है जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं l ऐसे में उन्हें उनके हिस्से की जो भी खाद सामग्री बनती है अगर उनके घर तक पहुंचा दी जाए तो शायद बहुत हद तक इस समस्या से बचा जा सकता है और सही व्यक्ति तक लाभ भी पहुंच सकता है .

इसके अलावा प्रधानमंत्री जी की जितनी भी योजनाएं आती है उन योजनाओं का लाभ और उसकी जानकारी आप वेबसाइट और ब्लॉक के साथ जनप्रतिनिधियों द्वारा लोगों के बीच संपर्क स्थापित कर किया जा सकता हैं .उन्होंने कहा कि करोना एक वैश्विक बीमारी है जो एक दूसरे के संपर्क में आने से फैलती है . ऐसे में हम सबको मिलकर एक दूसरे का सहयोग करना ही होगा l

जनबोल न्यूज

नेपाल के प्रधानमंत्री ओली के दवारा दिए गए विवादास्पद बयान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , गृहमंत्री अमित शाह एवं यूपी के मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी समेत बड़े भाजपा नेताओं के चुप्पी पर बिहार कांग्रेस प्रवक्ता राजेश राठौड़ ने निशाना साधा। प्रदेश प्रवक्ता राजेश राठौड़ ने कहा की एक तरफ नेपाल के प्रधानमंत्री अयोध्या को नेपाल में बता रहे हैं,देश के नक्शे पर हमारे देश की जमीन को दिखा रहे हैं, सीमा पर छेड़छाड़ कर रहे हैं।मगर देश के प्रधानमंत्री-गह मंत्री समेत पुरी भाजपा खामोश है।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा की दिन-रात पाकिस्तान का नाम जपने वाले भाजपा के बड़े नेता नेपाल के करतूत पर आखिर खामोश क्यों हैं।प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि नेपाल ने अपने नक्शे में भारत की जमीन को दिखाने का दुस्साहस किया है।भारत के श्रद्धेय प्रभु श्री रामचंद्र को नेपाली बताने का हरकत किया है।इसके बावजूद भाजपा नेपाल पर चुप्पी हैं। उन्होंने कहा की आज तक हर मोर्चे तथा हर विषय में भारत का साथ देने वाला नेपाल भी अब केंद्र सरकार के दुर्भावनापूर्ण नीतियों के कारण आज हमारे खिलाफ हो गया है।

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि लद्दाख पर ध्यान फोकस कराया जा रहा है और यहां नेपाल अयोध्या को विवादित बनाने पर जुट गया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुप्पी आज पूरे देश को दिख रही है। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि झूठे वादों तथा जमलो के बदौलत सत्ता में आने वाले वास्तविक मसलों पर इसी तरह चुप्पी साधे रहते हैं। जिसे आज पूरा देश समझ चुका है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में देश की जनता भाजपा का नामोनिशान मिटा देगी। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि नेपाल के हरकतों पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार,उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत प्रधानमंत्री तथा गह मंत्री की खामोशी देश के साथ किए गए किसी गनाह से कम नहीं।