जनबोल न्यूज

गोपालगंज में आये दिन जिस तरह से कोरोना मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही हैं उसको देखकर प्रशासन की ओर से आये दिन अभियान चलाकर लोगो को मास्क ओर सोशल डिस्टेंस का पालन कराया जा रहा है उसके बाद भी लोगों के दिल दिमाग़ में कोरोना को लेकर सावधानी नही बरती जा रही हैं. बरौली प्रखण्ड के मोगल विरेचा में स्थित सेंट्रल बैंक में आये दिन बैंक में लेन देन को लेकर सोशल डिस्टेंस का मजाक बनाया जा रहा है इसको लेकर आसपास के लोगो मे कोरोना का डर भय बना रहता है

बता दें कि गोपालगंज में बैंक में सोशल डिस्टेंस का मजाक उड़ाने का मामला एक बैंक का नही बल्कि सैकडों बैंकों में आये दिन सोशल डिस्टेंस का मजाक बनाया जा रहा है

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आज पटना में छात्रसंगठन आइसा के द्वारा आइसा के राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस के तहत प्रदर्शन किया ,नई शिक्षा नीति वापस लो-शिक्षा का बाजारीकरण करना बंद करो-गरीबो-मध्यमवर्गीय को शिक्षा से वंचित करने का प्रयास नही चलेगा नारो के साथ.

सभा को संबोधित करते हुए आइसा के राज्य सह सचिव आकाश कश्यप ने कहा कि मोदी सरकार के द्वारा रात के अंधेरे में और बिना सदन में चर्चा किये हुए मोदी सरकार जो नई शिक्षा नीति लाए है इसके खिलाफ पूरे देश मे आज प्रदर्शन हो रहे है इस शिक्षा नीति का जब हम अध्य्यन करते है तो यह शिक्षा नीति गरीबों-मध्यमवर्गीय परिवार से शिक्षा वंचित करने वाली नीति है कुल मिलाकर जिसके पास पैसे रहेंगे वह शिक्षा ले पाएंगे दूसरी ओर उच्च शिक्षा पे हमला है शोध को कमजोर करने वाली नीति है जब देश मे शोध ही नही होगा तो भारत कैसे बनेगा

विश्वगुरु यह भारत का नौजवान पूछता है मोदी जी से इसलिए आइसा का साफ साफ मानना है यह शिक्षा नीति छात्र विरोधी नीति है आज से हमलोगों ने आंदोलन की शुरुवात किये है आने वाले दिनों में तमाम संगठन को एकजुट करके इसके खिलाफ जबरदस्त आवाज बुलंद करेंगे ,आकाश कश्यप ने कहा बिहार बाढ़ और कोरोना के जेहन में आईआईटी जेईई-नीट परीक्षा देने वाले परीक्षार्थी परीक्षा का डेट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं आइसा इस पेंडेमिक समय में छात्रों के मांग के साथ खड़ा है दूसरी तरफ बिहार में इंटर में एडमिशन चल रहा है आइसा ने बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को लेटर भेज कर मांग किया है कि एडमिशन का डेट बढ़ाया जाए और सहूलियत के साथ तमाम छात्रों का एडमिशन हो!

आज के प्रदर्शन मे आलोक यादव,मॉडल दीपू राज, सुमित जयसवाल,दीपक यादव,बसंत,जिनिश यादव,साहिल जैसवाल,आकाश नयन,रोहित गौतम,राहुल कुमार,रौशन सहित दर्जनों छात्र थे!

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जनता द्वारा चुने जाने के बाद मुख्‍यमंत्री व मंत्री संविधान सम्‍मत शपथ ग्रहण के दौरान प्रदेश की जनता की रक्षा का शपथ लेते हैं, मगर बिहार में इन्‍हीं लोगों ने शपथ की गरिमा को तार – तार कर दिया। खुद नीतीश कुमार गुमशुदा नजर आये। वे बिहार के गुमशुदा मुख्‍यमंत्री हैं। कोरोना संकट में उनकी गुमशुदगी ताजा उदाहरण है। उक्‍त बातें आज जनतांत्रिक विकास पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अनिल कुमार ने आज पार्टी कार्यालय में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस कर कही। साथ ही उन्‍होंने गुमशुदा मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के 15 साल के कार्यकलापों का पोल खोलने के लिए आगामी 16 अगस्‍त को ‘बिहार नवनिर्माण रैली’ के नाम से डिजिटल रैली करने का भी एलान किया।

उन्‍होंने कहा कि वैश्‍विक महामारी कोरोना में देश में अचानक लॉकडाउन हुआ, जिसमें दूसरे प्रदेशों में फंसे बिहार के 40 लाख से अधिक श्रमिक फंस गए। उस वक्‍त उनके पास रहने – खाने का भी संकट हो गया था। तब गुमशुदा मुख्‍यमंत्री अपने ही लोगों को लाने को तैयार नहीं थे और जब हम लोगों ने सरकार पर दवाब बनाया, तो उनकी वापसी तो हुई। लेकिन इस सरकार ने अपने ही श्रमिक भाईयों को प्रवासी बता दिया। हद तो तब हो गई, जब इनकी पुलिस ने नोटिफिकेशन जारी कर कहा कि इन मजदूर भाईयों को वजह से क्राइम बढ़ेगी। यह बेहद दुर्भाग्‍यपूर्ण था, जिसकी खिलाफत हमने पुरजोर तरीके से की।

अनिल कुमार ने बिहार की स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था और सरकार की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये। उन्‍होंने कहा कि हमने पहले से ही सरकार को प्रदेश की स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था को लेकर आगाह किया था, लेकिन प्रदेश की गुमशुदा नीतीश सरकार सुनने को तैयार नहीं थी। नतीजा आज बिहार में कोरोना संक्रमण के केस 80 हजार को पार करने वाले हैं। वो भी तब जब एक ओर जांच घोटाला भी जोर – शोर से जारी है। बिहार ऐसा पहला प्रदेश बन गया, जहां कोरोना काल में तीन – तीन स्‍वास्‍थ्‍य सचिव बदल दिये गए। मेरा मानना है कि बिहार पहला ऐसा प्रदेश है, जहां बिना जांच के भी स्‍वास्‍थ्‍य विभाग रिपोर्ट देने को आतुर है। ऐसे मैसेज हमारे पास भी आये, जो यह साबित करता है कि जांच के आंकड़ों का दावा पूरी तरह फर्जी है। वहीं, नोबल कोरोना वायरस के कारण भारत में होने वाली डॉक्टर की कुल मौतों का 0.5 प्रतिशत है। हालांकि, बिहार में, डॉक्टरों की मृत्यु का प्रतिशत 4.75 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से नौ गुना अधिक है। ऐसे में थाली, ताली, दीया और फूल की वर्षा तो खूब हुई, मगर उनके जान की हिफाजत के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। और जो घोषणा कोरोना की लड़ाई में शहीद डॉक्‍टरों के लिए हुई, उसका लाभ उनके परिजनों को भी नहीं मिला।हम मांग करते है कि सभी कोरोना वॉरियर्स जिसमें विशेषकर डॉक्टर,स्वास्थ्य कर्मी , पुलिसकर्मी,आशा ,ममता,जीविका इत्यादि सभी के परिजनों को 1 करोड़ का अनुदान राशि दी जाए साथ ही उन सभी को शहीद का दर्जा दिया जाए।

अनिल कुमार ने कहा कि मुख्‍यमंत्री, स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री या कोई वरीय अधिकारियों ने एक दिन भी डॉक्‍टरों या कोरोना वारियर्स को लेकर हाई लेवल मीटिंग तक नहीं की। उनकी मुख्‍यमंत्री स्‍तर पर कोई प्रॉपर ट्रेनिंग नहीं हुई। सभी बिहार से गायब हैं। सभी सांसद और विधायक अपने क्षेत्र से गायब हैं। क्‍या इसी के लिए जनता ने उन्‍हें चुना था। कुमार ने आगे कहा कि डॉक्‍टरों पीपीई किट की सुविधा मुहैया नहीं करवाने वाली नीतीश सरकार अपनी नाकामी छुपा कर आज वर्चुअल रैली कर चुनाव की तैयारी में लगी है। जो लोग आज वर्चुअल रैली कर रहे हैं, उन्‍होंने कभी दूर देहात के अस्‍पतालों का हाल जानना भी जरूरी नहीं समझा। शहरों में अस्‍पताल की हालत कितनी खराब है, ये केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल के नेतृत्‍व में बिहार आयी तीन सदस्य टीम ने अपनी रिपोर्ट में उजागर कर दिया। बिहार की बिगड़ती गुई कोरोना स्थिति पर उनकी टीम ने रिपोर्ट किया कि बिहार के अस्‍पताल कोरोना से लड़ाई में सबसे फिसड्डी है।

उन्‍होंने कहा कि एनएमसीएच में 700 बेड का अस्‍पताल है, लेकिन कोरोना काल में 100 बेड भी तैयार नहीं थी। जब इसकी शिकायत एनएमसीएच अधीक्षक ने की तो उन्‍हें ही निलंबित कर दिया गया। जो एक अस्‍पताल एम्‍स, जहां अच्‍छे इलाज की सुविधा है, उसको वीवीआई बना दिया गया, क्‍यों। पीएमसीएच की कुव्‍यवस्‍था किसी से छुपी नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ राजधानी पटना में कोरोना का संक्रमण 13 हजार के पार जा चुकी है और हर रोज 500 के करीब लोग संक्रमित हो रहे हैं, जब यहां जांच की रफ्तार काफी कम है। 17 जुलाई की मेडिकल जर्नल लैंसेट की रिपोर्ट में भारत के तमाम राज्यों के 20 ज़िलों का ‘वल्नरबिलिटी इंडेक्स’ बताया गया है। 20 में से 8 ज़िले अकेले बिहार के हैं। इसमें ये बताया गया है कि कौन सा राज्य कोरोना की चपेट में आने के बाद उससे लड़ने के लिए कितना तैयार है। इस इंडेक्स में मध्य प्रदेश के बाद नंबर आता है बिहार का। WHO और ICMR दोनों ही संस्थाएँ कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में टेस्टिंग को सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई मानती है। लेकिन प्रदेश की सरकार उसी में पिछड़ती जा रही है।

उन्‍होंने कहा कि ये कितना दुर्भाग्‍यूपर्ण है कि राज्‍य के गुमशुदा मुख्‍यमंत्री, उपमुख्‍यमंत्री, स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री किसी ने भी कोरोना वारियर्स, स्‍वास्‍थ्‍य कर्मियों, डॉक्‍टरों, पुलिस आदि के लिए संवदेना के दो शब्‍द तक कहना जरूरी नहीं समझा। हम पहले ही लॉकडाउन से सरकार से अस्‍पतालों की हालत सुधारने, डॉक्‍टरों को पीपीई किट उपलब्‍ध करवाने और जांच में तेजी लाने का आग्रह किया। लेकिन ये सरकार सुनती कहां है। सत्ता का अहंकार इतना है कि प्रदेश की जनता पर आयी विपदा से उन्‍हें कोई मतलब नहीं है। वे कुर्सी रिन्‍यूल में लगे हैं। 15 सालों में बिहार को बर्बाद कर दिया। जहां दूसरे राज्‍य विकास की रफ्तार में तेजी से भाग रहे हैं, वहां बिहार आज भी सालों पुरानी चीजों को लेकर पेरशान है। ऐसी सरकार को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं है। इसलिए हम आपसे अपील करते हैं कि अब वक्‍त है फैसला लेने का।

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मोदी कैबिनेट द्वारा नई शिक्षा नीति को पारित कर दिया गया है। जहां एक ओर सरकार का कहना है की नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को आसान बनाना है वहीं अगर नई शिक्षा नीति का गहराई से अध्ययन किया जाए तो इस नीति का उद्देश्य सरकार के दावों के ठीक विपरीत दिखाई देता है। नई शिक्षा नीति समाज में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से हाशिए पर स्थित समुदायों को बहिष्कृत करने की नीति है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का आधार प्रधानमंत्री का इस साल का सबसे मशहूर जुमला “आत्मनिर्भर” है। नई शिक्षा नीति के उद्देश्य एवं सिद्धांत अधिकार आधारित दृष्टिकोण की बजाए कर्तव्य आधारित दृष्टिकोण की तस्वीर पेश करते हैं। अर्थात सरकार अपने शिक्षा सुनिश्चित करने के दायित्व से पीछे हटकर यह कार्य प्राइवेट सेक्टर को सौंप रही है साथ ही निजी क्षेत्रों को विचारों को नियंत्रित करने का अधिकार दे रही है।

उच्च शिक्षा में मल्टीपल एग्जिट प्वाइंट (अर्थात 4 साल के ग्रेजुएशन को पहले, दूसरे अथवा तीसरे वर्ष में भी छोड़ देने पर सर्टिफिकेट) एडवांस सर्टिफिकेट इत्यादि के प्रबंध को नई शिक्षा नीति का आकर्षण बिंदु बनाकर इस नीति को एक बड़े सकारात्मक बदलाव के रूप में पेश किया जा रहा है, किंतु वास्तविकता तो यह है कि इस तरह का प्रावधान अंततःअसमानता को ही बढ़ावा देगा। इस तरह की नीति गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को और अधिक हाशिए पर ढकेलेगी तथा शिक्षा का अधिकार एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगा। यह नीति अकादमिक एकरूपता के जरिये से विचारों को नियंत्रित करने की भी कोशिश है। तदनुसार आम परीक्षाओं एवं प्रशासन पर केंद्र का नियंत्रण है किंतु निजी एवं सार्वजनिक संस्थानों को लोगों का शोषण करने की पूर्ण वित्तीय स्वतंत्रता है।

नई शिक्षा नीति का केवल एक ही प्रयोजन है और वह है निजी संस्थानों को बढ़ावा देना। इस नीति द्वारा सरकार अपने इस मंसूबे को स्कूल तथा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी तथा सार्वजनिक-परोपकार की साझेदारी का चोगा ओढ़ा रही हैl एनईपी निजी कंपनियों और सरकार को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराती है । देश में लंबे समय से छात्र आंदोलनों की निजी शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाइयों की नीतियों को लागू करने की मांग के बावजूद एनईपी में इसका जिक्र तक नहीं है।

एनईपी संविधान के संघीय ढांचे पर भी हमला हैl शिक्षा समवर्ती सूची में है तथा परामर्श और समन्वय की मांग करता है, एकरूपता की नहीं ।इसी तरह, नीति का प्रारूप ऑनलाइन शिक्षा और शिक्षण में प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने की बात करता है, लेकिन छात्रों के लिए इस प्रौद्योगिकी की पहुंच और सामर्थ्य का विस्तार कैसे होगा यह सुनिश्चित करने में विफल है ।

एनईपी स्पष्ट रूप से सरकार द्वारा यह दावा करने कि शिक्षा पर खर्च में वृद्धि होगी इस विषय पर चर्चा नहीं करती कि यह होगा कैसे। निवेश और व्यय का बोझ “निजी परोपकार” साझेदारी के माध्यम से निजी कंपनियों और व्यक्तियों पर है, जो स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों के कॉर्पोरेट अधिग्रहण के लिए एक चोगा मात्र है ।

सरकार स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों स्तर पर स्व-नियमन को बढ़ावा देकर शिक्षा क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी त्याग कर निजी कंपनियों को बढ़ावा दे रही है। एनईपी बड़े स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पक्ष में छोटे स्कूलों और कॉलेजों को बंद करना प्रस्तावित करता है, जो सार्वजनिक वित्त पोषित शिक्षा को नष्ट करने के अलावा कुछ भी नहीं है ।

स्कूल शिक्षा:
एनईपी स्कूल शिक्षा में मौजूदा 10 + 2 संरचना को “एक नए शैक्षणिक और पाठयक्रम पुनर्गठन” के साथ 5+ 3+3+4 में बदलने का प्रस्ताव रखता है और इस संरचना में 3 से 18 वर्ष के छात्र-छात्राएं सम्मिलित होंगे। एनईपी का तर्क है कि वर्तमान 10+2 संरचना 3-6 आयु वर्ग के बच्चों पर ध्यान नहीं देती है क्योंकि औपचारिक शिक्षा कक्षा 1 में शुरू होती है और वह 6 साल की उम्र में शुरू होती है। इसलिए नई 5+3+3+4 संरचना, 3 साल की उम्र से अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन (ईसीसीई) प्रदान करेगी।

ईसीसीई की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी केंद्रों की है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं/शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा, खेलने के उपकरण और अच्छे बुनियादी ढांचे की व्यवस्था की जाएगी। यहां तक कहा गया है कि 10+2 और उससे अधिक की योग्यता वाले आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं/शिक्षकों को ईसीसीई में 6 महीने का प्रमाण पत्र कार्यक्रम दिया जाएगा; और कम शैक्षिक योग्यता वाले लोगों को एक वर्ष का डिप्लोमा कार्यक्रम दिया जाएगा। बच्चों के लिए शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए डीटीएच चैनलों का इस्तेमाल और डिजिटल/दूरी के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल प्रस्तावित किया गया है ।

हालांकि, दस्तावेज अनुबंध, मानदेय आधारित कार्य के बजाय स्थायी नौकरी की गारंटी देने में विफल हैl स्थायी नौकरी तो दूर की बात है, न्यूनतम वेतन की गारंटी भी नहीं है। डिजिटल डिवाइड के सवाल पर यह दस्तावेज यह नहीं बोलता कि इससे उन लोगों तक डिजिटल पहुंच कैसे बढ़ेगी, जिनके पास टीवी, बिजली, इंटरनेट, स्मार्ट फोन या गैजेट्स तक नहीं है। इंटरनेट की पहुंच राष्ट्रीय स्तर पर केवल 40% है और ग्रामीण क्षेत्र और भी हाशिए पर हैं ।

एनईपी का तर्क है “प्रशिक्षित सहायककर्मी (स्थानीय समुदाय से व उसके बाहर दोनों) “, उसके अतिरिक्त सहायता सत्र, कैरियर मार्गदर्शन से संबंधित मुद्दों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की देखरेख और सुरक्षा पहलुओं को देखते हुए “एक पर एक सहकर्मी ट्यूशन” की व्यवस्था की जाए। साफ तौर पर सरकार सार्वजनिक शिक्षा में गुणवत्ता और सस्ती शिक्षा प्रदान करने की अपनी जिंमेदारी से दूर रहना चाहती हैl

सरकार की अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश:
नई शिक्षा नीति निजीकरण शब्द के इस्तेमाल से बचते हुए सरकार द्वारा शिक्षा से जुड़ी हुई अपनी सभी जिम्मेदारियों को त्याग कर निजी संस्थानों को जनता का आर्थिक शोषण करने की सुविधा उपलब्ध कराने का नाम है। यह नीति निजीकरण को सार्वजनिक-परोपकार साझेदारी का नाम देकर शिक्षा जैसी मूलभूत जिम्मेदारी से सरकार का पल्ला झाड़ लेना है।

अन्य भाषाओं पर संस्कृत का वर्चस्व:
अन्य भाषाओं को नजरअंदाज करते हुए संस्कृत संवर्धन पर अत्यधिक जोर देना मोदी सरकार की संस्कृत के वर्चस्व को स्थापित करने की मंशा को स्पष्ट करता है। दस्तावेज में अन्य भाषाओं की बात जरूर की गई है किंतु संस्कृत पर दिया गया अत्यधिक जोर सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। इसी प्रकार भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणाली और प्रथाओं पर सरकार का अत्यधिक ध्यान बाद में देश के विभिन्न चरणों में विकसित अन्य प्रथाओं को नजरअंदाज और अस्वीकार करने का प्रयास जैसा लगता है। “जहां भी संभव हो, कम से कम ग्रेड 5 तक लेकिन अधिमानतः ग्रेड 8 और उससे आगे तक अनुदेश का माध्यम घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा होगीl” यह शिक्षा के माध्यम में एक व्यवस्थित परिवर्तन है और शिक्षकों की उपलब्धता, शिक्षा सामग्री की गुणवत्ता और यह भी कि इसे कैसे लागू किया जाएगा, पर सवाल उठते हैं। सार्वजनिक तथा निजी दोनों संस्थानों में इस प्रकार मातृभाषा को अनिवार्य बनाना विद्यार्थियों को उस भाषा में शिक्षण लेने से वंचित करता है जिसमें वे शिक्षित होना चाहते हैं।

सरकारी स्कूलों को बंद करना:
एनईपी 2020 स्कूल कॉम्प्लेक्स नामक समूह संरचना के नाम पर सरकारी स्कूलों को “सुनियोजित ढंग से” बंद करने को बढ़ावा देता है। जिसमें स्कूलों में कम नामांकन अनुपात स्कूल बंद होने का कारण दिखाया जा रहा है। सरकारी स्कूलों में कम नामांकन अनुपात का कारण वास्तव में सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता की कीमत पर निजी स्कूलों को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना और स्कूली शिक्षा से संबंधित शिक्षण, अधिगम और बुनियादी ढांचे के मुद्दों में सार्वजनिक निवेश की कमी है। त्रुटिपूर्ण नीति को ठीक करने के बजाय एनईपी 2020 सरकारी स्कूलों को बंद करने को बढ़ावा देता है।

निजी स्कूलों को आर्थिक शोषण की खुली छूट:
एनईपी ने आवश्यक गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रीस्कूल एजुकेशन-निजी, सार्वजनिक और परोपकारी सहित शिक्षा के सभी संस्थानों के लिए स्व-नियमन या प्रत्यायन प्रणाली का प्रस्ताव दिया है। राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एसएसएसए) नामक एक स्वतंत्र, राज्यव्यापी निकाय की स्थापना की जाएगी। यह और कुछ नहीं बल्कि सरकार द्वारा गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निजी कंपनियों पर छोड़ने के लिए एक आवरण है जैसा कि सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी किया गया है ।
उच्च शिक्षा:
समरूपता और अकादमिक स्वतंत्रता का केंद्रीकरण:
सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और संस्थानों के लिए राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा परीक्षाओं के संचालन का केंद्रीकरण हालांकि आदर्श लगता है, लेकिन वास्तव में यह कॉलेजों/विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता से वंचित करता है। फिलहाल, एनईपी बोझ को कम करने की बात करता है किंतु NEET तथा अन्य अखिल भारतीय परीक्षाओं का NTA अथवा अन्य एजेंसियों द्वारा केंद्रीकृत आयोजन नई समस्याओं को जन्म देगा।

सार्वजनिक वित्त पोषित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को बंद करना:
स्कूल शिक्षा की तरह ही एनईपी मे 3000 या उससे अधिक छात्रों के बड़े बहुविषयक विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और एचईआई क्लस्टर/नॉलेज हब का गठन प्रस्तावित करती है। इसका स्पष्ट अर्थ है- बड़े बहुविषयक विश्वविद्यालयों के पक्ष में छोटे या मध्यम सरकारी वित्त पोषित विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों या संस्थानों को बंद करना। सबसे नृशंस रूप से, यह दस्तावेज नालंदा और तक्षशिला के संदर्भ का उपयोग बड़े विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए कॉलेजों को बंद करने के अपने बुरे इरादों वाले तर्क को न्यायोचित ठहराने के लिए करता है ।

पुनर्गठन के नाम पर सार्वजनिक वित्तपोषण का निजीकरण अथवा समापन:
ये उच्च शिक्षा संस्थान (एचईआई) भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) द्वारा शासित होंगे । एचईसीआई के तहत एचईआई के प्रत्येक मुद्दे से संबंधित विभिन्न इकाइयां होंगी जो संरचना का हिस्सा होंगी। राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी) शिक्षक शिक्षा सहित उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए एकल बिंदु नियामक होगा केवल चिकित्सा और कानूनी शिक्षा इसके अंतर्गत नहीं होंगे। दूसरी संस्था ‘Meta-Accrediting Body’ (जिसे मान्यता के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (एनएसी) कहा जाता है) होगी। तीसरा उच्च शिक्षा अनुदान परिषद (एचईजीसी) होगा, जो फंडिंग नियमित करेगा । चौथी संस्था होगी जनरल एजुकेशन काउंसिल जोकि अकादमिक स्तर को बेहतर बनाने का कार्य करेगी। इसका तकनीकी रूप से अर्थ है यूजीसी और अन्य मौजूदा निकायों को खत्म किया जाएगा।

इन एचईआई की अध्यक्षता बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (बीओजी) करेंगे। बीओजी के पास फीस पर फैसला करने, एचईआई के प्रमुख सहित नियुक्तियां करने और शासन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होगाl शासन का यह मॉडल स्वायत्तता और अकादमिक उत्कृष्टता को केंद्रीकृत और नष्ट कर देगा।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जैसी विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा अनुसंधान के वित्तपोषण के समन्वय के लिए एक राष्ट्रीय अनुसंधान कोष की स्थापना की जाएगी। यह समन्वय स्वायत्त वित्तपोषण व्यवस्था को नियंत्रित करने के अलावा कुछ नहीं हैl

एनईपी में यह भी कहा गया है कि निजी और सार्वजनिक संस्थानों के बीच कोई अंतर नहीं होगा, जो सार्वजनिक संस्थानों के वित्तपोषण से सरकार के पीछे हटने का संकेत देता है । इस बीच, एक स्वायत्त डिग्री देने वाले कॉलेज (एसी) उच्च शिक्षा के एक बड़े बहुविषयक संस्थान का गठन होगा जो स्नातक की डिग्री प्रदान करेगा और मुख्य रूप से स्नातक शिक्षण पर केंद्रित होगा, हालांकि यह उस तक सीमित नहीं रखा जाएगा और यह आम तौर पर एक आम विश्वविद्यालय से छोटा होगा ।

शिक्षा के भीतर सामाजिक भेदभाव का कोई संज्ञान नहीं, सामाजिक न्याय के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं:
यह वही भाजपा की सरकार है जिस के शासन में पूरे देश ने रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या के विरोध में एक व्यापक आंदोलन देखा । रोहित के लिए न्याय की मांग करते हुए इस आंदोलन में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हाशिए के समाज से आने वाले विद्यार्थियों के प्रति होने वाले भेदभाव तथा उत्पीड़न की ओर सभी का ध्यान केंद्रित किया गया। और आज यही भाजपा की सरकार नई शिक्षा नीति पारित कर रही है जिसमें शैक्षिक संस्थानों में होने वाले भेदभाव एवं उत्पीड़न के विषय में कोई बात नहीं की गई है। नई शिक्षा नीति संस्थागत उत्पीड़न एवं भेदभाव को वंचित एवं हाशियाकृत विद्यार्थियों की समस्या की तरह देखती है और सरकार को संस्थानों में समता एवं न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से दूर रखती है।

वर्गीकृत असमानता और बच्चों को पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर करना:

एनईपी से 4 वर्षीय बहुविषयक बैचलर कार्यक्रम एक आपदा होगा जैसा कि हमने दिल्ली विश्वविद्यालय में FYUP प्रणाली के साथ देखा है। जिसका न केवल छात्रों और शिक्षकों ने विरोध किया बल्कि अंततः शिक्षा और शिक्षा देने में विफल रहने पर प्रशासन को भी इसे वापस लेना पड़ा। उच्च शिक्षा में मल्टीपल एंट्री/एग्जिट का मतलब है कि अच्छी फाइनेंशियल कंडीशन वाले स्टूडेंट्स ही अपनी डिग्री पूरी कर पाएंगे । गरीब छात्रों को डिप्लोमा से ही समझौता करना होगा। साथ ही एक साल में सर्टिफिकेट, 2 साल में डिप्लोमा, 3 साल में बैचलर मूल रूप से डिग्रियों का अवमूल्यन है क्योंकि इन डिग्रियों को लेने के लिए मजबूर किसी को भी पढ़ाई बीच में छोड़ने वाला माना जाएगा। यदि इन पाठ्यक्रमों को अलग नहीं कर रहे हैं, और एक बड़े 4 साल मॉड्यूल का ही हिस्सा सर्टिफिकेट डिप्लोमा तथा बैचलर हैं, तो यह डिग्रियों का अवमूल्यन ही है।

निजी विश्वविद्यालयों को फण्ड एवं बढ़ावा देने वाली एक नीति:
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 समय समय पर शिक्षा में निजी निवेश एवं परोपकार की ‘महत्ता’ पर बल देती है। यह न केवल निजी निवेश एवं परोपकारी उद्यमों को आमंत्रण है जिससे कि वे उच्च शिक्षा में अपने व्यापार को बढ़ा सकें, बल्कि ये ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों को सरकारी सहायता का भी वादा करती है। हम सभी जानते हैं कि ऐसे परोपकारी उच्च शिक्षा संस्थान कौन होंगे। यह उच्च शिक्षा के निजी एवं कॉरपोरेट नियंत्रण की व्यंजना ही है।
पहले तो नीति नए उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए कम नियंत्रण का वायदा करती है। जबकि एक और स्तर और मानकों के नाम पर, राष्ट्रीय शिक्षा नीति सरकारी वित्त पोषित संस्थानों को बंद करने का एक यंत्र है, वहीं दूसरी ओर यह नए विश्वविद्यालयों को खोलने में गुणवत्ता और स्तर की चिंता न करने का वायदा करता है। इससे इतर, शुल्क निर्धारण के प्रगतिशील राज को प्रोत्साहित करके यह नीति स्पष्ट तौर पर उच्च शिक्षा में शुल्क वृद्धि और बहिष्करण का सृजन कर रही है।

स्वायत्तता के नाम पर शुल्क वृद्धि और स्ववित्तपोषण को लागू करना:
महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के पास श्रेणीबद्ध स्वायत्तता होगी। प्रत्यायन की श्रेणियाँ किसी संस्थान की स्वायत्तता निर्धारित करेंगी। कोई संस्थान जिसकी प्रत्यायन की श्रेणी उच्च होगी वह शुल्क वृद्धि कर सकेगा, इस प्रकार गरीबों और वंचितों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बहिष्कृत कर दिया जायेगा क्योंकि विश्वविद्यालय निश्चित तौर पर नये स्व-वित्तपोषी पाठ्यक्रम लायेंगे जिससे कि वे स्वयं ही फण्ड इकट्ठा कर सकें। यह पहले ही कुछ समय से कार्य में लाया जा चुका है, जैसे कि यूजीसी का परिसमापन और HEFA ऋणों की स्वीकृति को पहले ही मूर्त किया जा चुका है।

निजी विश्वविद्यालयों को शोषण की स्वतंत्रता:
स्वविनियमन की प्रणाली निजी विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करेगी जहाँ संस्थान को शिक्षा, सीखने, अवस्थापना, शुल्क एवं अन्य मुद्दों पर स्व-घोषणा देनी होगी। इस प्रकार यह सरकार के नियंत्रण का अंत करेगी। यह उच्च शिक्षा में भयंकर परिणामों की ओर लेकर जाएगी जिसमें निजीउद्द्मियों को फ़ीसवृद्धि करने औऱ गरीबों एवं वंचितों के बहिष्कृत करने में कोई रोक-टोक नहीं होगी।

ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर डिजिटल डिवाइड और बहिष्करण मजबूत करना:
शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन शिक्षा शुरू करने पर जोर दिया गया है। यह और कुछ नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था से समाज के हाशिए पर स्थित समुदायों से आने वाले विद्यार्थियों को बाहर करने की नीति है। यह नीति इस बारे में बात नहीं करती है कि यह कैसे इंटरनेट पहुंच बढ़ाएगी, डिजिटल डिवाइड को कम करेगी और शिक्षा की पहुंच, और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी। इसी तरह, दूरस्थ शिक्षा पर जोर शिक्षा के विचार के खिलाफ जाता है। NEP एक स्वायत्त निकाय, नेशनल एजुकेशनल टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) बनाने की बात करती है,जो “उच्च शिक्षा, मूल्यांकन, नियोजन, प्रशासन स्कूल और उच्च शिक्षा दोनों के लिए” प्रदान करेगा। हालाँकि नीति यह बात नहीं करती है कि यह डिजिटल विभाजन को कैसे समाप्त करने जा रही है। यह ऐसी शिक्षा के लिए आवश्यक डिजिटल गैजेट्स की पहुंच को कैसे बढ़ाएगीl नीति फंडिंग के विषय में कुछ स्पष्ट नहीं करती जिसका सीधा अभिप्राय यह है कि इसका भार विद्यार्थियों पर थोप दिया जाएगा और निजीकरण के लिए मार्ग प्रशस्त होगाl

एमफिल को खत्म करना और एकीकृत कार्यक्रम में एमए की अवधि को कम करना केवल मोदी सरकार के शोध के प्रति समझ की कमी को दर्शाता है । एमफिल प्रशिक्षण का मैदान है और अनुसंधान की गुणवत्ताको बढ़ाने में इसका महत्व है। एमफिल को हटाकर सरकार ने भारत में रिसर्च को फंडिंग और सपोर्ट कम करने के अपने इरादे का संकेत दिया है। “शैक्षणिक मार्ग” के बारे में नई नीति का मूल रूप से मतलब है (भले ही यह बेहतर पाठ्यक्रमों को डिजाइन करने और एक बेहतर शिक्षक होने की गुंजाइश देता है) शिक्षक बुनियादी कक्षाएं ले सकते हैं और प्रशासन/शासन में पद सुनिश्चित करने की सीढ़ी पर आगे बढ़ने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं । यह विश्वविद्यालय प्रणाली में शिक्षण की स्वायत्त प्रकृति को खत्म करने तथा सरकार के हुक्म के अनुसार चलने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने की ओर एक कदम है।

समावेश के नाम पर यह नीति वास्तव में, बहिष्कार के लिए नीति के अलावा कुछ नहीं है। AISA इस शिक्षा विरोधी मसौदे को खारिज करता है और मांग करता है कि इसे तुरंत वापस लिया जाए और संसद में इस पर चर्चा की जाए।

जनबोल न्यूज

जन अधिकार पार्टी लोकतांत्रिक के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव एवं राष्ट्रीय प्रधान महासचिव एजाज अहमद ने मुल्क, सुबा बिहार और खास तौर से मुस्लिम भाई-बहनों को ईद-उल- अज़हा की मुबारकबाद और बधाई दी है । और कहा कि कुर्बानी का यह त्योहार, त्याग ,समर्पण और कुर्बानी के साथ-साथ एक दूसरे से मोहब्बत का पैगाम भी देता है।

मालूम हो कि इस्लाम धर्म के मानने वाले तमाम लोग हज़रत इब्राहिम (अस) के द्वारा अल्लाह के खुशनुदी में सबसे प्यारी चीज को कुर्बान करने की याद में सुन्नत की अदायगी के लिए जानवरों की कुर्बानी खुदा के हुज़ूर मे पेश करते हैं । और इस बात का अहद करते हैं कि अल्लाह उनकी कुर्बानी और त्याग को कुबूल फरमाए ।

नेताओं ने तमाम लोगों से अपील और इल्तजा कि है कि कोरोना वायरस जैसी वबा से तमाम इंसानों की हिफाज़त के लिये नमाज़ में दुआ करें। और अल्लाह ताला कोरोना वायरस जैसी महामारी से मुल्क और सुबा बिहार के लोगों को परेशानियों और मुसीबतों से छुटकारा दे। साथ ही मूल्क और सुबा के तमाम लोगों के साथ कौमी एकता और भाईचारे के साथ इस पर्व को मनाने की अपील की है। साथ ही साथ वबा से बचने के लिए फिजिकल डिस्टेंस का ख्याल रखने की भी अपील की है।

जनबोल न्यूज

 सचिव, कृषि विभाग, बिहार डॉ० एन० सरवण कुमार ने सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग, बिहार द्वारा आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रेस एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को सम्बोधित करते हुए कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन की स्थिति में कृषि विभाग द्वारा किये गये महत्त्वपूर्ण कार्यों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताया।

डॉ० एन० सरवण कुमार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक बहुत बड़ा मुद्दा है और कृषि के क्षेत्र में भी इसका कुप्रभाव पड़ा है। गत खरीफ, वर्ष 2019 में 7.68 लाख हेक्टेयर तथा रबी, वर्ष 2019-20 में 5.25 लाख हेक्टेयर में अत्याधिक/असामायिक वर्षापात के कारण खड़ी फसल की क्षति हुई। सरकार द्वारा त्वरित कार्रवाई करते हुए 15.32 लाख किसानों को खरीफ फसल के नुकसान के लिए 652 करोड़ रूपये तथा 18.39 लाख किसानों को रबी फसल के नुकसान के लिए 568 करोड़ रूपये अर्थात 1220 करोड़ रूपये कृषि इनपुट अनुदान के रूप में किसानों के बैंक खाते में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सहायता उपलब्ध कराया गया।

उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन की स्थिति में कोरोना संक्रमण के बचाव के लिए आवश्यक सरकार के दिशा-निदेशों का पालन करते हुए गेहूँ की कटाई ससमय करा ली गई। इस वर्ष मानसून में 01 जून से लेकर 30 जुलाई, 2020 तक 506.4 मिली मीटर सामान्य वर्षापात के विरूद्ध 740.4 मिली मीटर वास्तविक वर्षापात हुआ है, इस प्रकार सामान्य से 46 प्रतिशत ज्यादा वर्षापात के कारण तथा नदियों में जल स्तर बढ़ने के कारण राज्य के 11 जिलों में बाढ़ की स्थिति से खरीफ फसल विशेषकर धान को नुकसान हुआ है। अभी तक राज्य में 33 लाख हेक्टेयर धान के रोपनी के लक्ष्य के विरूद्ध 29.22 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में रोपनी का कार्य लगभग पुरा किया जा सका है, जो कि लक्ष्य का 90 प्रतिशत है। बाढ़ की स्थिति वाले जिलों में जिला पदाधिकारी को प्रारम्भिक सर्वेक्षण का कार्य करने का अनुरोध किया गया है। प्रारम्भिक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 4.87 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फसल को नुकसान प्रतिवेदित हुआ है। सरकार पानी के निकल जाने के बाद किसानों को खड़ी फसलों के वास्तविक नुकसान के अनुसार नुकसान की भरपाई आपदा प्रबंधन के द्वारा तय मानकों के अनुसार किया जायेगा।

डॉ० कुमार ने बताया कि कृषि विभाग द्वारा डिजिटल कृषि के अंतर्गत किसानों को सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। इस खरीफ मौसम में 5.40 लाख किसानों के बीच अनुदानित दर पर बीज वितरण बिहार राज्य बीज निगम द्वारा किया गया, जिसमें से 40 हजार किसानों को उनके माँग के अनुसार बीज की होम डिलिवरी की गई। अभी से अगले रबी मौसम के लिए किसानों से ऑन-लाईन रबी फसल के बीज के लिए आवेदन प्रारम्भ कर दिया गया है। आज तक 44 हजार किसानों ने बीज के लिए ऑन-लाईन आवेदन किया है, जिसमें से 4 हजार 500 किसान बीज की होम डिलिवरी चाहते है।

सचिव, कृषि ने बताया कि बिहार सरकार द्वारा कृषि विभाग, बिहार को हर खेत को पानी के सर्वेक्षण का जवाबदेही दी गई है। वैसे सभी जिले जो बाढ़ से प्रभावित नहीं है, वहाँ सर्वेक्षण का कार्य जारी है। कृषि विभाग द्वारा 10 जिलों में समय से टिड्डी दल का प्रकोप को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया गया।

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भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीनिवास बी वी जी के अध्यक्षता कार्यकाल के गौरवशाली एक वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उनके सेवाभाव की भावना  से प्रेरणा लेते हुए बिहार प्रदेश युवा कांग्रेस ने लाकडॉउन मे  ज़रूरतमंद लोगों के पटना के बिंदेश्री नगर, वार्ड 22 में जरूरतमंद लोगों के बीच सूखे राशन का वितरण किया तथा जीवन पर्यन्त उनके पदचिन्हो पर चलने का संकल्प लिया।

इस मौक़े पर उपस्थित बिहार युवा कांग्रेस के प्रभारी , राष्ट्रीय सचिव राजेश कुमार सन्नी जी ने बताया की जब कॉरोना महामारी के भय से लोग लॉक डॉउन में घरों से निकल नहीं रहे थे तब श्रीनिवास जी ने प्रवासी मजदूरों की हर तरीके से मदद की और हजारों की संख्या में उन्हें बिहार लौटने का साधन उपलब्ध कराया ।

प्रदेश अध्यक्ष गुंजन पटेल ने बताया कि बिहार में आज भी लॉकडाउन में गंभीर रुप से बीमार और असहाय लोगों के दवाईयों एवम् राशन को बाढ़ प्रभावित इलाकों में पहुंचने का काम श्रीनिवास जी ने अपने नेतृ्त्व में किया है ,जो बिहार के नौजवानों के लिए अपने आप में अनुकरणीय है , इस अवसर पर उपाध्यक्ष कुमार रोहित, ज़िला अध्यक्ष मुकुल यादव, बिट्टू यादव, श्री कृष्ण हरि, विवेक चौबे , अंजिष्णु भारती उपस्थित रहे।

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बिहार में रालोसपा के प्रदेश उपाध्यक्ष बबन यादव कोरोना से जंग जीतने के लिए तीन दिवसीय अभियान चला रहें है . बिहार में बढ़ते कोरोना मामले को लेकर बबन यादव ने अपनी भावनाएं व्यक्त की. उन्होने कहा की  आज मैं बहुत दुखी हूं कि क्षेत्र के अन्तर्गत वार्ड 38 में रहने वाले चाई टोला के एक व्यक्ति की  कोरोना से ओर एक दलदली के व्यवसायी अशोक जी का निधन हो गया.

इसलिए आज मुझे चाई टोला के लोग इस दुख के घड़ी में बुलाये थे सेनेटराइज़ करने के लिये इसलिये मैं आज समस्त चाई टोला के एक एक घर दुकान को खुद अच्छी तरह सेनेटराइज़ किया ।और अब मेरा सेनेटराइज़ करने का अभियान लगातार दलदली में चलेगा तीन दिनों तक,31जुलाई से 2 अगस्त तक चलेगा , शुक्रवार,सनिवार, रविवार । ।

 

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बिहार में लॉकडाउन बढ़ाने की खबर महज एक अफवाह है .लॉकडाउन आदेश के संबंध में आज एक पत्र सोशल मीडिया में प्रसारित किया जा रहा है। जिसमें 16 दिनों के लॉकडाउन बढ़ाने की खबर आ रही थी.

गृह विभाग, बिहार सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह नकली है। सभी को इस फर्जी पत्र की सामग्री को नजरअंदाज करना चाहिए।

बता दें की बिहार में कोरोना के बढ़ते मामले को देखते हुए बिहार सरकार ने 31 जुलाई तक ही लॉकडाउन की घोषणा  की है . इसे आगे बढ़ाने की कोई अधिकारिक घोषणा नही हुई है .

बिहार में कोरोना का अपडेट

बिहार  राज्य में कोरोना  दिन पर दिन कहर बरपा रहा है .  आज 2328 नए कोरोना संक्रमित मरीज मिले हैं। इनमें 28 जुलाई को 1528 और 27 जुलाईं व इसके पहले  800 नए संक्रमित शामिल हैं। इसके साथ ही राज्य में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर 45,919 हो गयी।

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करपी प्रखण्ड मुख्यालय स्थित थाना गेट के सामने स्टेट हाइवे पर स्थानीय समाजसेवी एवं जदयू अतिपिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव डॉ ज्योति ने कोरोना की जंग जीत डयूटी पर लौट करपी थानाध्यक्ष पंकज कुमार को गुलाब पुष्प देकर सम्मानित किया।इस अवसर पर उपस्थित सभी पुलिस पदाधिकारियों के ऊपर पुष्प वर्षा किया गया।डॉ ज्योति के द्वारा कोरोना योद्धा के सम्मान में स्टेट हाइवे पर 20 फ़ीट लंबी सोशल डिस्टेंसिंग पेंटिंग बनाई गई।

इस अवसर पर आसपास खड़े लोगो ने भावुक होकर भारत माता की जय के नारे भी लगाए।कोरोना योद्धा के सम्मान में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ ज्योति ने कहा कि अपने जिले से दूर दूसरे जिले में अपराधियों के पकड़ने हेतु छापेमारी के दौरान थानाध्यक्ष जी कोविड से संक्रमित हो गए थे।अपने धर्य,साहस एवं सयंम से चंद दिनों में रोग पर विजय प्राप्त कर आज फिर लोगो की सेवा में हाजिर हैं।

इन्होंने यह भी कहा कि कुछ असामाजिक तत्व के लोग करपी थाना के कार्यकलापों पर नाजायज आरोप लगाते हैं जो उनसभी के कुंठित मानसिकता को दर्शाता है।ये वही लोग है जिनके गलत कार्यों को करने में ऐसे थानाध्यक्ष के रहते परेशानी हो रही है।अपने मंसूबे में असफल होने पर ऐसे असामाजिक तबके के लोग जनता के नजरो में अच्छे दिखने के लिए बेबुनियाद मनगढ़ंत आरोप प्रत्यारोप कार्टर रहते हैं।वर्तमान में करपी थाना के सभी अधिकारी कर्मचारी पूरी निष्ठा एवं लगन से लोगो की सेवा करते हैं।डॉ ज्योति ने लॉक डाउन के दौरान थानाध्यक्ष पंकज कुमार,एसआई देवकांत सिन्हा,एसआई सतेंद्र सिंह, एसआई प्रमोद कुमार सहित सभी पुलिस पदाधिकारियों के द्वारा कोरोना महामारी एवं लोक डाउन के दौरान पूरी निष्ठा से कार्य करने की सराहना की।मौके पर उपस्थित विधायक प्रतिनिधि जदयू नेता धर्मदेव सिंह ने भी करपी पुलिस की जमकर सराहना की।इधर लोगो के प्यार से गदगद थानाध्यक्ष ने डॉ ज्योति सहित थाना क्षेत्र के आमजनता को शुक्रिया कहा।उन्होंने कहा कि कोरोना संक्रमण के दौरान क्षेत्र के लोगों ने काफी हिम्मत और हौसला अफजाई किया है।मैं हर विपदा की घड़ी में अपनी पूरी पुलिस टीम के साथ जनता की सेवा में ततपर रहूंगा।इस अवसर पर जदयू अनुसूचित जनजाति (आदिवासी प्रकोष्ठ)के जिलाध्यक्ष पुरुषोत्तम कुमार जदयू अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के जिला सचिव,सद्दाम हुसैन लोजपा नेता सिंटू कुमार,शैलेन्द्र विद्यार्थी,सुधांशु कुशवाहा,उपेंद्र मिस्त्री उपस्थित थे शंकर गुप्ता नारायण खत्री कन्हाई कुमार धनंजय रजक